228 गाँव, अधूरी रोशनी: अबूझमाड़ में बिजली संकट के कारण और जवाबदेही?

गाँव में बिजली आपूर्ति बाधित होने के कारण और जिम्मेदार कौन?

गाँवों में बिजली की नियमित आपूर्ति न होने की समस्या एक जटिल विषय है, जिसमें कई कारण और पक्ष शामिल होते हैं। यह केवल एक वजह से नहीं होती, बल्कि बिजली विभाग, स्थानीय लोग और प्रशासन—तीनों की भूमिका मिलकर इस स्थिति को प्रभावित करती है।


228 गाँव, अधूरी रोशनी: अबूझमाड़ में बिजली संकट के कारण और जवाबदेही?

जब देश चाँद की बात करता है, तब अबूझमाड़ आज भी अंधेरे में जी रहा है

दोस्तों, आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ भारत चाँद तक पहुँचने के सपने साकार कर रहा है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल इंडिया की बातें हर जगह हो रही हैं। लेकिन इसी भारत के दिल में बसा एक इलाका ऐसा भी है, जहाँ आज भी रात ढलते ही ज़िंदगी अंधेरे में डूब जाती है।

मैं बात कर रहा हूँ छत्तीसगढ़ के नारायणपुर ज़िले के ओरछा (अबूझमाड़) ब्लॉक की—जहाँ 228 से अधिक गाँव घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसे हुए हैं। यहाँ रहने वाली अबूझमाड़िया जनजाति आज भी विकास की रोशनी से कोसों दूर है।


228 गाँव, अधूरी रोशनी: अबूझमाड़ में बिजली संकट के कारण और जवाबदेही

कोड़तामरका, हांदावाड़ा, कुतुल, गड़पा, गत्तकाल, गवाड़ी, घमंडी, आकाबेड़ा, अलवाड़ा और गुंडेकोट जैसे गाँवों में बिजली कोई सुविधा नहीं, बल्कि एक सपना बन चुकी है। कई जगहों पर दिन में मुश्किल से 3–4 घंटे ही बिजली मिलती है। बाक़ी समय बच्चे लालटेन की रोशनी में पढ़ने की कोशिश करते हैं, बुज़ुर्ग अंधेरे में समय काटते हैं और पूरा गाँव खामोशी से व्यवस्था की लापरवाही सहता रहता है।

कहीं ट्रांसफार्मर क्षमता से कम हैं, तो कहीं तकनीकी खराबी को महीनों तक ठीक नहीं किया जाता। कुछ जगहों पर मजबूरी में लोग गैरकानूनी तरीकों से बिजली इस्तेमाल करते हैं, और फिर उसी मजबूरी को अपराध बना दिया जाता है।

सवाल ये नहीं है कि हम चाँद पर कब पहुँचेंगे, सवाल ये है कि अबूझमाड़ के घरों में रोशनी कब पहुँचेगी?

डिजिटल भारत की चमक के पीछे छिपी यह सच्चाई हमें याद दिलाती है कि विकास तब तक अधूरा है, जब तक आख़िरी गाँव का आख़िरी घर अंधेरे में है।

बिजली विभाग की भूमिका

सबसे बड़ी जिम्मेदारी बिजली विभाग की होती है। कई बार लाइन की मरम्मत समय पर न होना, पुराने और कमजोर तारों तथा ट्रांसफॉर्मर को बदलने में देरी, और फॉल्ट की स्थिति में धीमी कार्रवाई जैसी लापरवाहियां इस समस्या को जन्म देती हैं। ग्रामीण इलाकों पर कम ध्यान देना भी विभाग की एक बड़ी कमी है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ के अबुजमाड़ इलाके में बिजली तो लगभग सभी घरों में पहुंचती है, लेकिन जलती नहीं, क्योंकि विभाग समय पर मरम्मत नहीं करता या कर्मचारी नक्सुसल प्रभावित इलाके में सुरक्षा संबंधी कारणों से वहां जाने से कतराते हैं।

सेवा व्यवस्था में खामियां

बिना सूचना के बिजली काट देना, शिकायतों का सही समाधान न मिलना और कर्मचारियों की कमी जैसी व्यवस्थागत कमजोरियां भी इस समस्या को बढ़ावा देती हैं। ये सभी बातें बिजली विभाग और उसके सिस्टम की विफलता को दर्शाती हैं।

स्थानीय लोगों की गलतियां

कई बार बिजली चोरी, अवैध कनेक्शन लेना और ओवरलोड मशीनों का उपयोग करने जैसी गलत हरकतें पूरे इलाके की बिजली आपूर्ति को प्रभावित करती हैं। ये गतिविधियां न केवल विभाग के काम में बाधा डालती हैं, बल्कि पूरे नेटवर्क को नुकसान पहुंचाती हैं। इसलिए स्थानीय लोगों की भी इस मामले में आंशिक जिम्मेदारी होती है।

प्रशासन की भूमिका

प्रशासन की निगरानी में यदि कमी रहती है और नियमों का सख्ती से पालन नहीं कराया जाता, तो समस्या और गहराती है। प्रशासन की यह कमजोरी बिजली आपूर्ति में व्यवधान का एक और कारण बनती है।

निष्कर्ष

गाँवों में बिजली कटौती की समस्या के लिए केवल किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। बिजली विभाग मुख्य रूप से जिम्मेदार है, किन्तु स्थानीय लोग और प्रशासन भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में दोषी हैं। यदि ये तीनों ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों का पालन करें, तो गाँवों में बिजली की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है।

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